आजादी की अगली लड़ाई: साथियों, 15 अगस्त 1947 को भारत ने एक ऐतिहासिक दिन देखा था।
सदियों की गुलामी के बाद हमारा देश स्वतंत्र हुआ। हमने अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, बलिदान दिए और एक ऐसे भारत का सपना देखा जहाँ हर व्यक्ति सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी सके।
लेकिन आज, स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद, हमें एक दूसरी गुलामी दिखाई दे रही है।
यह गुलामी किसी विदेशी सत्ता की नहीं है।
यह है – बीमारियों की गुलामी।
आज हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न है :-
क्या केवल देश का स्वतंत्र होना पर्याप्त है, यदि हमारे परिवार बीमारी, दवाइयों और अस्पताल के बढ़ते खर्चों के सामने आर्थिक रूप से असहाय होते जाएँ?
बीमारी केवल शरीर को नहीं, परिवार की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती है
कल्पना कीजिए एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की।
माता-पिता ने वर्षों की मेहनत से कुछ बचत की। बच्चों की पढ़ाई, घर, विवाह, भविष्य और वृद्धावस्था के लिए योजनाएँ बनाईं।
लेकिन परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बीमारी हो गई।
कुछ दिन अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
जाँच, दवाइयाँ, ऑपरेशन, अस्पताल का खर्च और उसके बाद लगातार चलने वाला उपचार—इन सबके बीच वर्षों की बचत का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है।
और यदि बीमारी लंबे समय तक चलती रहे तो समस्या केवल स्वास्थ्य की नहीं रहती।
वह परिवार की आर्थिक स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाती है।
जिस धन से बच्चों की शिक्षा बेहतर हो सकती थी, घर की जरूरतें पूरी हो सकती थीं या परिवार का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता था, उसका बड़ा हिस्सा बीमारी के उपचार में चला जाता है।
यही कारण है कि आज हमें स्वतंत्रता का अर्थ थोड़ा और व्यापक रूप से समझने की आवश्यकता है।
तब देश को बाहरी गुलामी से आजादी मिली।
अब परिवारों को बीमारी की गुलामी से आजादी दिलाने की जरूरत है।

बीमारी की गुलामी का एक बड़ा कारण क्या है?
बीमारी के अनेक कारण हो सकते हैं।
हर बीमारी को केवल व्यक्ति की गलती कहना उचित नहीं होगा। आनुवंशिक कारण, पर्यावरण, संक्रमण, उम्र, परिस्थितियाँ और अनेक अन्य कारक भी स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
लेकिन जीवनशैली से जुड़ी अनेक स्वास्थ्य समस्याओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर उठता है :-
क्या हमें अपने स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त ज्ञान है?
और उससे भी बड़ा प्रश्न –
जो ज्ञान हमें है, क्या हम उसका अनुशासनपूर्वक पालन करते हैं?
हम जानते हैं कि शरीर को संतुलित भोजन चाहिए।
फिर भी हम कई बार स्वाद को स्वास्थ्य से ऊपर रख देते हैं।
हम जानते हैं कि नियमित शारीरिक गतिविधि आवश्यक है।
फिर भी घंटों बैठे रहते हैं।
हम जानते हैं कि पर्याप्त नींद और तनाव का संतुलन महत्वपूर्ण है।
फिर भी अपनी दिनचर्या को लगातार नजरअंदाज करते हैं।
यानी समस्या केवल ज्ञान की कमी नहीं है।
समस्या कई बार ज्ञान और व्यवहार के बीच की दूरी भी है।
यही दूरी धीरे-धीरे स्वास्थ्य के जोखिम को बढ़ा चली जाती है।
स्वास्थ्य की स्वतंत्रता की शुरुआत स्वास्थ्य ज्ञान से होती है
हम अपने घर के लिए मोबाइल खरीदने से पहले बहुत शोध करते हैं।
कार खरीदते समय सारे specification देखते हैं।
बच्चों की शिक्षा के लिए वर्षों की योजना बनाते हैं।
लेकिन जिस शरीर के साथ हमें पूरी जिंदगी रहना है, उसके बारे में हम कितनी गंभीरता से सीखते हैं?
हमारे शरीर के संकेत क्या कहते हैं?
भोजन का हमारे स्वास्थ्य से क्या संबंध है?
दैनिक जीवन की कौन-सी आदतें स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकती हैं?
योग, व्यायाम, नींद, पोषण और मानसिक संतुलन की भूमिका क्या है?
आयुर्वेद की पारंपरिक समझ को आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण के साथ कैसे देखा जा सकता है?
इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर राजेश कुमार आरोही की पुस्तक “Health is Free – हेल्थ इज फ्री” तैयार की गई है।
पुस्तक को एक व्यावहारिक हिंदी स्वास्थ्य मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें preventive health, स्वस्थ जीवनशैली, पोषण, योग, आयुर्वेद और दैनिक आदतों पर सरल भाषा में चर्चा की गई है।
प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक शोध के बीच एक सेतु
भारत की स्वास्थ्य परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है।
आयुर्वेद ने भोजन, दिनचर्या, प्रकृति और शरीर के संतुलन को स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में देखा।
पुस्तक में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसी भारतीय परंपराओं में वर्णित औषधीय पौधों और प्राकृतिक स्वास्थ्य ज्ञान की चर्चा भी मिलती है।
दूसरी ओर आधुनिक विज्ञान लगातार नए शोधों के माध्यम से हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों को समझ रहा है।
इसलिए आवश्यकता किसी एक दृष्टिकोण को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं है।
आवश्यकता है :-
उपयोगी पारंपरिक ज्ञान को समझने की, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने की और दोनों को विवेकपूर्ण ढंग से देखने की।
“Health is Free” इसी दिशा में एक सेतु बनाने का प्रयास करती है।
पुस्तक की विशेषता इसकी व्यावहारिक शैली है – अनेक अध्याय सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं से शुरुआत करते हैं और पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों दृष्टिकोणों से समाधान की दिशा में विचार प्रस्तुत करते हैं।
बीमारी से बचाव केवल डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं
जब हम बीमार पड़ते हैं तो डॉक्टर के पास जाना आवश्यक है।
आधुनिक चिकित्सा ने मानव जीवन को बचाने और रोगों के उपचार में असाधारण योगदान दिया है।
लेकिन स्वास्थ्य की जिम्मेदारी केवल डॉक्टर, अस्पताल या दवा की नहीं हो सकती।
स्वास्थ्य की पहली प्रयोगशाला हमारा अपना दैनिक जीवन है।
हम क्या खाते हैं।
कितना चलते हैं।
कैसे सोते हैं।
तनाव से कैसे निपटते हैं।
अपनी दिनचर्या को कितना अनुशासित रखते हैं।
अपने शरीर के संकेतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
ये सभी प्रश्न हमारे स्वास्थ्य से जुड़े हैं।
इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा को परिवार की संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा।
बच्चों को केवल यह नहीं सिखाना चाहिए कि परीक्षा में अच्छे अंक कैसे लाएँ।
उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के साथ जीवन कैसे जिया जाए।
आजादी का नया संकल्प
15 अगस्त केवल झंडा फहराने का दिन नहीं है।
यह अपने जीवन और समाज के बारे में सोचने का भी अवसर है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर हम एक नया संकल्प ले सकते हैं:-
हम बीमारी को सामान्य मानकर स्वीकार नहीं करेंगे।
हम अपने स्वास्थ्य के बारे में सीखेंगे।
हम अच्छे स्वास्थ्य ज्ञान को अपनी दिनचर्या में उतारने का प्रयास करेंगे।
हम अपने परिवार में preventive health की संस्कृति विकसित करेंगे।
और सबसे महत्वपूर्ण –
हम स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को परिवार की संपत्ति बनाएँगे।
क्योंकि स्वस्थ परिवार ही मजबूत समाज बनाता है।
और मजबूत समाज ही मजबूत राष्ट्र बनाता है।
“Health is Free” – बीमारी की गुलामी से आजादी की दिशा में एक कदम
“Health is Free” का संदेश केवल यह नहीं है कि स्वास्थ्य का कोई मूल्य नहीं है।
इसका गहरा संदेश यह है कि स्वास्थ्य के अनेक महत्वपूर्ण आधार हमारे दैनिक जीवन, हमारी आदतों, हमारे ज्ञान और हमारे अनुशासन से जुड़े हैं।
पुस्तक का उद्देश्य practical health and wellness knowledge को सामान्य परिवारों के लिए सरल और सुलभ बनाना है।
इसे आप एक तरह से “गागर में सागर” कह सकते हैं – एक ऐसी पुस्तक जिसमें स्वास्थ्य से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों को एक स्थान पर समेटने का प्रयास किया गया है।
यह कोई बीमारी की स्थिति में डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है।
बल्कि इसका उद्देश्य है :-
बीमारी आने से पहले स्वास्थ्य को समझना।
ज्ञान को व्यवहार में बदलना।
और अपने परिवार को स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक बनाना।
आजादी की पहली लड़ाई हमने विदेशी शासन से लड़ी थी।
अब एक नई लड़ाई हमारे सामने है –
अज्ञानता, अस्वास्थ्यकर आदतों और बीमारी की बढ़ती गुलामी के विरुद्ध।
इस लड़ाई का हथियार कोई तलवार नहीं है।
इसका हथियार है –
स्वास्थ्य ज्ञान।
और इसकी शक्ति है :-
अनुशासन।
इस स्वतंत्रता दिवस पर आइए संकल्प लें –
“देश को आजाद रखने के साथ-साथ अपने परिवार को बीमारी की गुलामी से भी आजाद करेंगे।”
स्वस्थ व्यक्ति → स्वस्थ परिवार → स्वस्थ समाज → स्वस्थ भारत → समृद्ध भारत। ।
यही स्वतंत्रता की अगली यात्रा हो सकती है।
और शायद इसी अर्थ में—
Health is Free. With Logic.
- राजेश कुमार आरोही
संस्थापक: Primal Wisdom
लेखक – ‘हेल्थ इज फ्री’